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क्या अंतरजातीय विवाह धर्म विरुद्ध है? जानिए वेदों और इतिहास का छिपा हुआ सच

वैदिक मंत्रों और प्राचीन धर्मग्रंथों की पृष्ठभूमि में हिंदू विवाह संस्कार करते हुए एक वर-वधू

आज के दौर में जब भी ‘अंतरजातीय विवाह’ (Intercaste Marriage) की बात आती है, तो हमारे समाज में दो गुट बन जाते हैं। एक वह जो इसे ‘अधर्म’ मानता है और दूसरा वह जो इसे ‘आधुनिकता’ के नाम पर सही ठहराता है। लेकिन इन दोनों से अलग हटकर उस ‘सत्य’ को देखना अवश्य है जो हमारे वेदों और शास्त्रों में होते हुए भी दबा दिया गया है।

क्या विवाह हमेशा अपनी जाति में ही उत्तम रहता है? क्या जो अलग जातियों में विवाह करते है वो अधर्म का मार्ग चुनते है? क्या हमारा धर्म वास्तव में जन्म-आधारित पहचान का समर्थन करता है?

चलिए इन सभी प्रश्नों के उत्तर आज इस लेख में ढूंढने के प्रयास करते है।

शब्दों का मायाजाल: धर्म, विवाह और वर्ण का असली अर्थ

किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें उन बुनियादी शब्दों को समझना होगा जिनका अर्थ समय के साथ विकृत कर दिया गया।

  1. धर्म: धर्म का अर्थ केवल ‘पूजा पद्धति’ या ‘मजहब’ नहीं है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत के ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है— “जो धारण करने योग्य हो।” जो समाज और जीवन को संतुलन में रखे, वही धर्म है।
  2. विवाह: सनातन परंपरा में विवाह कोई ‘कॉन्ट्रैक्ट’ नहीं, बल्कि एक ‘संस्कार‘ है। यह दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन है ताकि वे साथ मिलकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग पर चल सकें।
  3. वर्ण बनाम जाति: यहाँ सबसे बड़ा भ्रम पैदा किया गया है। आज जिसे हम ‘जाति’ कहते हैं, वह जन्म से जुड़ी एक संकीर्ण पहचान बन गई है। जबकि प्राचीन ‘न्याय दर्शन’ में ‘जाति’ का अर्थ ‘सामान्य गुण’ होता था। जैसे गौ जाति अर्थात गाय की प्रजाति। ऐसे ही छान्दोग्य उपनिषद और वज्रसूची उपनिषद में जाति का अर्थ जन्म से जुड़ी किसी पहचान को बताया गया है।

हालांकि इसके साथ यह भी रोचक है कि वेदों में ‘वर्ण‘ का उल्लेख है, जो मनुष्य के ‘गुण‘ और ‘कर्म‘ (Merit and Action) पर आधारित था, न कि उसके पिता के नाम पर।

इतिहास के वो पन्ने जिन्हें हमसे छुपाया गया

यदि अंतरजातीय विवाह वास्तव में पाप या अधर्म होता, तो सनातन धर्म की नींव रखने वाले स्तंभ कभी अस्तित्व में ही न होते।

1. महर्षि वेदव्यास का जन्म

हिंदू धर्म के सबसे बड़े गुरु, जिन्होंने वेदों का संकलन किया और महाभारत लिखी— महर्षि वेदव्यास। उनके पिता ऋषि पराशर (एक उच्च कोटि के ब्राह्मण) थे और माता सत्यवती (एक मछुआरा समुदाय/निषाद की कन्या) थीं। इन दोनों के पुत्र महर्षि वेदव्यास सनातन धर्म के एक मजबूत स्तम्भ है।

2. यदुवंश और श्री कृष्ण

यदुवंश, जिसमे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया वो यदुवंश का प्रारंभ भी रोचक है। राजा ययाति (क्षत्रिय) और देवयानी (ऋषि शुक्राचार्य की पुत्री – ब्राह्मण) के विवाह से उनके पुत्र ‘यदु’ का जन्म हुआ। यदु से ही यदुवंश की शुरुआत हुई जिसमें आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं जन्म लिया। जिस कुल में भगवान ने जन्म लिया असल मे वो दो अलग-अलग वर्णों के मिलन से बना था।

3. सत्यकाम जाबाल की सत्यनिष्ठा

छांदोग्य उपनिषद में सत्यकाम जाबाल की कथा आती है। उन्हें अपनी जाति नहीं पता थी, उनकी माँ एक दासी थीं जिसने अनेक राजाओं की सेवाएं की थी। सत्यकाम के गुरु ने उनकी जाति नहीं, बल्कि उनके सत्य बोलने के गुण को देखकर उन्हें ‘ब्राह्मण’ घोषित किया।

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‘जातिवाद’ की बीमारी और विदेशी षड्यंत्र

सवाल उठता है कि फिर ये कट्टरता आई कहाँ से? इतिहास गवाह है कि मध्यकाल में जब भारत पर विदेशी हमले हुए, तो समाज ने खुद को बचाने के लिए रक्षात्मक रूप अपनाया। समाज अपनी पहचान बचाने के लिए ‘संकीर्ण’ (Rigid) होता गया।

रही-सही कसर 19वीं सदी में अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ (Divide and Rule) पॉलिसी ने पूरी कर दी। जनगणना (Census) के जरिए उन्होंने लचीली जातियों को खानों में बंद कर दिया ताकि भारतीय समाज कभी एकजुट न हो सके। आज जो लोग अंतरजातीय विवाह का कट्टर विरोध करते हैं, वे अनजाने में उसी ‘ब्रिटिश और मुग़ल’ सिस्टम की रक्षा कर रहे हैं जिसने हमारे समाज को तोड़ा था।

यहाँ हम हिंदू समुदाय के भीतर अंतरजातीय विवाह की बात कर रहे हैं। अंतर-धार्मिक (Inter-religious) विवाह एक अलग विषय है, क्योंकि वहाँ जीवनशैली और मूल विश्वास तंत्र (Belief System) में बड़ा टकराव होने की संभावना रहती है, जो वैवाहिक स्थिरता को कठिन बना सकता है।

उत्तम विवाह का आधार क्या होना चाहिए?

आज के समय एक सफल विवाह के लिए ‘Surname’ का मिलना जरूरी नहीं है, बल्कि ‘संस्कारों’ का मिलना अनिवार्य है। क्योंकि आज के समय अलग-अलग समाज से आने वाले हिन्दुओ की जीवनशैली भी लगभग एक जैसी ही हो गयी है। अब वो सामाजिक अंतर नज़र नही आता जैसे पहले हुआ करता था।

वेदों के अनुसार पार्टनर चुनते समय तीन चीजों पर गौर करना चाहिए:

सत्यम: क्या दोनों के विचार सत्य पर आधारित हैं?
शिवम: क्या वे एक-दूसरे और समाज के लिए कल्याणकारी हैं?
सुंदरम: क्या उनके चरित्र में सुंदरता है?

विवाह का आधार प्रेम, सत्य और आपसी सम्मान होना चाहिए। दो ऐसी आत्माएं जो एक-दूसरे के धर्म (कर्तव्य) में बाधा न बनें बल्कि सहायक बनें, उनका विवाह ही सर्वश्रेष्ठ है। आत्मा की कोई जाति नहीं होती। आत्मा न ब्राह्मण है, न शूद्र; वह केवल ईश्वर का अंश है। समाज की बेड़ियों से पहले सत्य की आवाज सुनें। क्योंकि जो सत्य है, वही सनातन है।

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