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कांवड़ यात्रा क्या है? जानिए इसका धार्मिक महत्व, इतिहास और पौराणिक कथाएँ

कांवड़ यात्रा पर पवित्र गंगाजल लेकर चलते शिवभक्त कांवड़िए

सावन (श्रावण) का महीना हिन्दू धर्म में भक्ति का विशेष महीना माना जाता है जिसमे भक्तों द्वारा भगवान भोलेनाथ की भक्ति हर जगह देखने को मिलती हैं। इस पूरे महीने में चारों ओर “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयकारे गूंजते हैं। इसी के साथ लोग सामूहिक रामायण पाठ भी करते है जो क्षेत्र के पुरे परिवेश को ही शांति प्रिय और आनंदित कर देता है। मगर सावन के महीने में जो परंपरा सबसे ज्यादा आकर्षित और भावविभोर करती है, वह है कांवड़ यात्रा।

लाखों-करोड़ों शिवभक्त (कांवड़िए) नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करके गंगाजल लाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है? इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई? पहली बार कांवड़ यात्रा किसने की थी?

आइए, इस लेख में कांवड़ यात्रा के अर्थ, इसके धार्मिक महत्व, कड़े नियमों और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं को विस्तार से समझते हैं।

कांवड़ यात्रा का अर्थ।

‘कांवड़’ शब्द संस्कृत के ‘कांवाँर’ से बना है। यह एक विशेष प्रकार की बहंगी (लकड़ी या बांस का ढांचा) होती है, जिसके दोनों सिरों पर दो छोटी मटकियाँ या लोटे बांधे जाते हैं। इन पात्रों में पवित्र नदियों (विशेषकर गंगाजी) का जल भरा जाता है।

जो भक्त इस कांवड़ को अपने कंधे पर रखकर पैदल यात्रा करते हैं और भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग या शिवालयों तक पहुंचते हैं, उन्हें ‘कांवड़िया’ कहा जाता है। कांवड़ को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता, जब तक कि जल से महादेव का अभिषेक न हो जाए। यह एक तरह का संकल्प होता है जिसमे संकल्पित व्यक्ति अपने कंधो पर कावड़ को लेकर एक लम्बा मार्ग तय करके मंदिर में शिव अभिषेक कर अपने संकल्प को पूरा करता है।

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कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व।

हिंदू धर्म में सावन के महीने में कांवड़ यात्रा करने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है:

कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर पौराणिक ग्रंथों में कई प्राचीन कथाएँ मिलती हैं:

1. समुद्र मंथन और भगवान परशुराम की कथा

सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तो उसमें से ‘हलाहल’ (विष) निकला। ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया, जिससे उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ा। विष के प्रभाव से महादेव का शरीर अत्यधिक गर्म होने लगा। तब भगवान परशुराम (जो शिवजी के परम भक्त थे) ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव (बागपत) में भगवान शिव का अभिषेक किया। गंगाजल अर्पित करने से महादेव को विष की जलन से राहत मिली। माना जाता है कि वहीं से कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।

2. श्रवण कुमार की कथा

एक अन्य मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के दौरान कांवड़ की शुरुआत की थी। जब उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान की इच्छा जताई, तो श्रवण कुमार उन्हें कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार ले गए और वापसी में अपने माता-पिता के लिए गंगाजल भी लाए।

3. राजा रावण द्वारा कांवड़ उठाना

लंकापति रावण भी शिवजी का महान भक्त था। समुद्र मंथन के समय जब शिवजी ने विष पिया, तो रावण ने अपने तपोबल से गंगाजल लाकर महादेव का अभिषेक किया था, जिससे विष का नकारात्मक प्रभाव समाप्त हुआ था। हालांकि यह बात एक लोकमान्यता है और किसी प्रमुख ग्रन्थ में इसका उल्लेख देखने को नहीं मिलता।

कांवड़ यात्रा के कड़े नियम।

कांवड़ यात्रा का पालन अत्यंत कठोर और अनुशासित नियमों के तहत किया जाता है:

सावन मास में जलाभिषेक का सही समय और परंपरा

सावन मास की शिवरात्रि के दिन या सावन के सोमवार को कांवड़ जल का विशेष महत्व होता है। भक्त हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख, सुल्तानगंज या स्थानीय पवित्र नदियों से जल लेकर अपने निकटतम या प्रसिद्ध शिव मंदिरों तक जाते हैं और महादेव का जलाभिषेक करते हैं। इसी के साथ, कुछ समूह और लोग अपने क्षेत्र में पवित्र नदियों का जल लाकर कावड़ यात्रा का आयोजन करते है और एक पद यात्रा करके शिवलिंग में अभिषेक के माध्यम से वो जल अर्पित करते है।

कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी सनातन संस्कृति की एकता, श्रद्धा और असीम भक्ति की जीवित मिसाल है। हर साल सावन के पवित्र महीने में लाखों शिवभक्त अपनी श्रद्धा की परीक्षा देते हुए महादेव को प्रसन्न करते हैं।

यदि आप भी इस सावन भगवान भोलेनाथ की कृपा पाना चाहते हैं, तो अपने निकटतम शिवालय में जाकर जल चढ़ाएं और “हर-हर महादेव” का जयकारा लगाएं।

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