मकर संक्रांति – भारत का एक ऐसा महापर्व जिसे हम बचपन से ‘तिल-गुड़’ और ‘पतंगबाजी’ से जोड़कर देखते आए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदू धर्म के अधिकतर त्योहार (जैसे दिवाली या होली) हर साल अपनी तारीख बदलते हैं, पर मकर संक्रांति हमेशा 14 या 15 जनवरी को ही क्यों आती है?
क्या यह महज एक संयोग है, या हमारे ऋषियों की कोई बहुत बड़ी वैज्ञानिक खोज?
आज हम मकर संक्रांति के उन रहस्यों को डिकोड करेंगे जो शायद आपको किसी स्कूल की किताब में नहीं पढ़ाए गए।
1. मकर संक्रांति का खगोलीय विज्ञान: तारीख क्यों बदलती है? (The Precession of Equinoxes)
अक्सर लोग तर्क देते हैं कि हिंदू कैलेंडर पुराना है, लेकिन सच इसके ठीक उलट है। मकर संक्रांति का दिन वह है जब सूर्य ‘मकर राशि’ (Capricorn) में प्रवेश करता है।
हज़ारों साल पहले यह त्योहार 31 दिसंबर को मनाया जाता था, आज हम इसे 14 जनवरी को मनाते हैं, और आने वाले 5000 सालों में यह फरवरी के अंत में मनाया जाएगा। इसे विज्ञान की भाषा में ‘Precession of Equinoxes’ कहा जाता है। हमारी धरती अपनी धुरी पर थोड़ा झुककर घूमती है, जिससे नक्षत्रों की स्थिति धीरे-धीरे बदलती है।
पश्चिमी कैलेंडर (Gregorian) स्थिर है, इसलिए वह समय के साथ पिछड़ जाता है। लेकिन हमारा सनातन पंचांग (Sidereal Calendar) ब्रह्मांड की वास्तविक स्थिति पर आधारित है। यही कारण है कि हमारी गणना आज भी सटीक है।
2. सूर्य बनाम चंद्रमा: भावनाओं से अनुशासन की ओर
सनातन धर्म में दो प्रकार की ऊर्जाओं का वर्णन है— सौर (Solar) और चांद्र (Lunar)।
चंद्रमा: हमारे मन, भावनाओं (Emotions) और चंचलता का प्रतीक है।
सूर्य: अनुशासन (Discipline), स्पष्टता (Clarity) और आत्मा का प्रतीक है।
मकर संक्रांति सूर्य का पर्व है। यह हमें संदेश देता है कि जीवन में सिर्फ भावनाओं के बहाव में नहीं बहना चाहिए, बल्कि सूर्य की तरह एक निश्चित दिशा और अनुशासन में आगे बढ़ना चाहिए।
3. उत्तरायण: मृत्यु पर विजय और चेतना का जागरण
महाभारत का वह दृश्य याद करें जब भीष्म पितामह तीरों की शैय्या पर लेटे हुए थे। उनके पास स्वेच्छा मृत्यु का वरदान था, फिर भी उन्होंने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण (मकर संक्रांति) का इंतज़ार किया। क्यों?
क्योंकि उत्तरायण में सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से, हमारे शरीर के भीतर की ऊर्जा (Prana) भी इस समय मूलाधार से सहस्रार की ओर, यानी नीचे से ऊपर की ओर उठने के लिए तैयार होती है। यह समय मुक्ति (Liberation) और आत्म-साक्षात्कार के लिए सबसे अनुकूल माना गया है।
4. रीतियों के पीछे छिपा मनोविज्ञान
तिल और गुड़: तिल ‘तपस्या’ का प्रतीक है—कठोर और छोटा। गुड़ उस तपस्या के बाद मिलने वाली ‘मिठास’ है। यह हमें सिखाता है कि बिना कठिन परिश्रम (तिल) के जीवन में सफलता (गुड़) नहीं मिलती।
पतंगबाजी: पतंग का आकाश में ऊंचा जाना हमारे ‘ऊंचे विजन’ को दर्शाता है, जबकि उसकी डोर हमारे ‘संयम’ (Control) को। यदि संयम टूट जाए, तो पतंग का कटना निश्चित है।
एक राष्ट्र, एक सूर्य
मकर संक्रांति यह सिद्ध करती है कि भारत सांस्कृतिक रूप से हमेशा से एक था। पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में बिहू और गुजरात में उत्तरायण—नाम अलग हैं, लेकिन केंद्र में ‘सूर्य’ और उसकी ऊर्जा ही है।
यह पर्व जड़ता (Inertia) को छोड़कर गतिशीलता की ओर बढ़ने का संकेत है।
आपको यह वैज्ञानिक विश्लेषण कैसा लगा? नीचे कमेंट्स में बताएं और इस इन्फोग्राफिक को अपने उन मित्रों के साथ साझा करें जो सनातन धर्म के पीछे का तर्क (Logic) समझना चाहते हैं।

