एक पावन भूमि, जो केवल एक सामान्य तीर्थ स्थल नहीं बल्कि सनातन धर्म के अदम्य संघर्ष और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। यह प्रथम ज्योतिर्लिंग वह पावन धरा है, जहाँ 17 बार बर्बर आक्रांताओं ने हमला कर एक समृद्ध संस्कृति की आत्मा पर प्रहार किया, अपार स्वर्ण संपदा लूटी और आस्था के केंद्र को जमींदोज करने का प्रयास किया। इसके बावजूद, हर ध्वंस के बाद यह देवालय राख से उठकर पुनः गगनचुंबी शिखर के रूप में स्वाभिमान से खड़ा हुआ।
यह भारत की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव हैं।
अरब सागर की उत्ताल तरंगें और क्षितिज तक फैला अथाह जल विस्तार; सोमनाथ मंदिर परिसर के प्रांगण से समुद्र को निहारने पर ऐसा ही आलौकिक दृश्य सम्मोहित कर देता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र स्थित वेरावल के प्रभास पाटन में सागर तट पर विराजमान इस देवालय के ऐतिहासिक व पौराणिक निर्माण व सांस्कृतिक महत्व का विवरण गीर सोमनाथ जिले के आधिकारिक इतिहास में भी प्रमाण के साथ मिलता है। उसके साथ ही इसके पीछे देवों, राजाओं और धर्मावलंबियों का अप्रतिम योगदान रहा है।
चंद्रदेव पर दक्ष का श्राप और अमावस्या-पूर्णिमा का आरंभ
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण स्वयं चंद्रदेव (सोम) ने करवाया था, क्योंकि इसी पावन तट पर उन्हें एक घोर श्राप से मुक्ति मिली थी।
प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियाँ थीं, जो 27 नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करती थीं। दक्ष ने अपनी इन सभी कन्याओं का विवाह चंद्रदेव के साथ इस कठोर प्रतिज्ञा के साथ किया था कि वे सभी से समान प्रेम करेंगे और किसी प्रकार का भेद नहीं रखेंगे। विवाह उपरांत चंद्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी के प्रति सर्वाधिक अनुरक्त रहे। उपेक्षा से व्यथित होकर शेष 26 बहनों ने अपने पिता दक्ष से इसकी व्यथा कही।
क्रोधित होकर प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को क्षय रोग से ग्रस्त होकर अपनी कांति (चमक) खो देने का शाप दे दिया।
चंद्रमा के निष्प्रभ होते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में प्राकृतिक असंतुलन गहराने लगा। औषधियों का क्षरण होने लगा और जीवन चक्र डगमगा गया। श्राप मुक्ति और आभा पुनः प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी के निर्देश पर चंद्रदेव प्रभास पाटन के इस पवित्र सागर संगम पर आए और यहाँ महामृत्युंजय मंत्र से भगवान आशुतोष की कठोर तपस्या की।
भगवान शिव चंद्रदेव की अनन्य निष्ठा से प्रसन्न हुए। प्रजापति का श्राप पूर्णतः शून्य करना मर्यादा के विरुद्ध था, अतः महादेव ने वरदान दिया:
“तुम्हारा तेज 15 दिन क्षीण होगा और 15 दिन पुनः अपनी पूर्ण कांति की ओर बढ़ेगा।”
चंद्रमा जब अपने पूर्ण रूप में प्रकाशित होता है, वह पूर्णिमा कहलाती है; और जब उसका तेज पूर्णतः लुप्त हो जाता है, वह तिथि अमावस्या बनती है। भारतीय पंचांग की यही खगोलीय व्यवस्था शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के रूप में काल गणना का आधार बनी।
श्राप मुक्त होकर चंद्रदेव ने भगवान शिव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए यहाँ स्वर्ण के एक भव्य मंदिर की स्थापना की। चंद्रदेव का ही एक नाम ‘सोम’ है, और उनके नाथ होने के कारण देवाधिदेव महादेव का यह स्वरूप “सोमनाथ” कहलाया।
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प्रथम ज्योतिर्लिंग के गर्भगृह का रहस्य: हवा में तैरता अलौकिक शिवलिंग
इतिहास के थपेड़ों से सोमनाथ मंदिर का बाह्य स्वरूप निरंतर बदलता रहा, परंतु मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूल ज्योतिर्लिंग सदा से असीम आकर्षण और रहस्य का केंद्र रहा।
प्राचीन दस्तावेज़ों और यात्री वृत्तांतों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग कोई साधारण पाषाण प्रतिमा नहीं थी, बल्कि वह गर्भगृह की भूमि से लगभग दो फीट ऊपर बिना किसी प्रत्यक्ष सहारे के हवा में अधर झूलता रहता था। मंदिर के वास्तुकारों ने गर्भगृह की दीवारों और छत में विशेष चुंबकीय पाषाणों (लोडस्टोन) का प्रयोग कर एक अत्यंत सटीक चुंबकीय संतुलन प्रणाली तैयार की थी, जिसके गुरुत्वाकर्षण-रोधी प्रभाव से शिवलिंग शून्य में स्थिर रहता था।
मध्यकालीन फारसी इतिहासकार अलबरूनी (जो 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के आक्रमण के समय भारत आया था) और जकारिया अल-काज़विनी ने अपनी कृतियों में इस चमत्कारिक अधर-शिवलिंग की मुक्तकंठ से पुष्टि की है। अलबरूनी ने न केवल इस चुंबकीय वास्तुकला के अचूक विज्ञान का सविस्तार वर्णन किया, बल्कि सोमनाथ नगर के वैभव, अगाध संपदा और नगर की अतुलनीय सांस्कृतिक संपन्नता का भी साक्ष्य प्रस्तुत किया।
17 बार बर्बर आक्रांताओं का भीषण तांडव
वर्ष 1026 ईस्वी में सोमनाथ पर क्रूरता का जो प्रहार हुआ, वह इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों से दर्ज है। हालांकि यह मंदिर पर पहला आक्रमण नहीं था। इससे पूर्व 725 ईस्वी में सिंध के अरब सूबेदार जुनैद के निर्देश पर आक्रमण हुआ था, जिसे प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने विफल कर मंदिर का पुनरुद्धार किया था।
1026 ईस्वी में गजनी का आक्रांता महमूद गजनवी लगभग 80,000 की उन्मादी सेना लेकर गुजरात में प्रविष्ट हुआ। उस कालखंड में भारत कई क्षेत्रीय रियासतों में बंटा हुआ था। आंतरिक मतभेदों और राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी का लाभ विदेशी बर्बरों ने निरंतर उठाया।
जब गजनवी प्रभास पाटन पहुँचा, तो सोलंकी वंश के नरेश राजा भीमदेव प्रथम, उनके रणबांकुरों और शस्त्रहीन सामान्य स्थानीय श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था की रक्षा हेतु प्राचीर बनकर शत्रु सेना का मुकाबला किया। तीन दिनों तक चले भीषण संघर्ष में लगभग 50,000 निहत्थे नागरिकों और साधकों ने देवालय की रक्षा में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर जब गजनवी ने हवा में तैरते शिवलिंग को देखा, तो वह चकित रह गया। उसने दीवारों की चुंबकीय शिलाओं को तुड़वाकर उस पावन शिवलिंग को गिराया, उसे खंडित किया और मंदिर के अकूत स्वर्ण, हीरे-जवाहरात को लूटकर ले गया। इतिहास के कुछ आख्यान कहते हैं कि भक्तों ने उस मूल शिवलिंग के पवित्र अवशेषों को अपनी जान पर खेलकर सुरक्षित रखा, जो पीढ़ियों से एक गोपनीय धरोहर बने रहे।
विनाश का यह कुचक्र यहीं नहीं थमा
- अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1299 ईस्वी): खिलजी के सेनापति उलूग खान और नुसरत खान ने गुजरात अभियान के दौरान पुनः सोमनाथ को लूटा और ध्वस्त किया।
- मुगल काल और औरंगजेब का विध्वंसकारी फरमान: क्रूर मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को नेस्तनाबूद करने के दो बार आदेश दिए। पहली बार 1665 ईस्वी में उसने मंदिर को खंडित कराया, परंतु श्रद्धालुओं ने मलबे के बीच से भी शिव-अर्चना बंद नहीं की। 1706 ईस्वी में औरंगजेब ने सेना भेजकर सोमनाथ को पूर्णतः मलबे में तब्दील करने का बर्बर फरमान जारी किया, जिसके बाद यह तीर्थ लंबे समय तक खंडहर बना रहा।
मात्र संपदा की लूट नहीं, सनातन संस्कृति पर सुनियोजित आघात
आक्रांताओं के लिए सोमनाथ मंदिर केवल धन-दौलत का भंडार नहीं था, यह भारतीय अस्मिता, ज्ञान, परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का मेरुदंड था। उनका स्पष्ट उद्देश्य सनातन धर्म की मूल आस्था को मिटाकर अपने मजहब का परचम लहराना था।
किंतु, वे यह समझने में असमर्थ रहे कि सनातन केवल ईंट-पत्थरों के ढांचों में नहीं, बल्कि जनमानस की आत्मा, चेतना और श्वास में बसा हुआ अमर सत्य है। देवालय तोड़े जा सकते थे, परंतु शिवभक्तों की आस्था की लौ को बुझाना असंभव था।

18वीं शताब्दी में इस भग्न तीर्थ को मालवा की पुण्यश्लोक महारानी, परम शिवभक्त देवी अहिल्याबाई होल्कर का संबल मिला। 1783 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई ने मुख्य खंडहर के समीप ही एक गुप्त भूमिगत गर्भगृह बनाकर नवीन सोमनाथ मंदिर की प्रतिष्ठा की। इसके निर्माण का उद्देश्य यह था कि आक्रांताओं के भविष्य के किसी हमले की स्थिति में मुख्य पूजित शिवलिंग दृष्टिगोचर न हो और सनातनियों की पूजा का क्रम निर्बाध रूप से गतिमान रहे। यह मंदिर आज भी अपनी पवित्रता के साथ श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संबल देता है।
राख से उठकर पुनः खड़ा हुआ सनातन स्वाभिमान
सोमनाथ का 17 बार विध्वंस और 17 बार पुनर्निर्माण इतिहास का कोई सामान्य संयोग नहीं, अपितु भारतीय जनमानस के असीम शौर्य, अडिग श्रद्धा और पुनरुत्थान की अमिट दास्तान है। इस भूमि के पूर्वजों ने यातनाएं सहीं, रक्त बहाया, किंतु अपनी मूल जड़ों और महादेव के चरणों का त्याग नहीं किया।
वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 नवंबर 1947 को प्रभास पाटन की पावन भूमि पर सागर जल को हाथ में लेकर प्रण लिया कि सोमनाथ के प्राचीन गौरव को पुनः उसी भव्यता के साथ स्थापित किया जाएगा।
महात्मा गांधी ने इस संकल्प का स्वागत किया। एम. मुंशी ने भागीरथ प्रयास किए और 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कर-कमलों द्वारा वर्तमान भव्य सोमनाथ मंदिर के गर्भगृह में नवीन ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
आज जब आप सोमनाथ के उस विहंगम प्रांगण में खड़े होकर समुद्र की गर्जना सुनते हैं, तो आपको केवल एक मंदिर के दर्शन नहीं होते; वहाँ भारत की अजेय जिजीविषा और सनातन चेतना की अखंड ऊर्जा स्पंदित होती महसूस होती है। यह मंदिर साक्षी है कि समय के क्रूर पहिए और बर्बर तलवारें चाहे जितना प्रयास कर लें, सत्य, धर्म और सनातन का सूर्य कभी अस्त नहीं हो सकता।