भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा गरुड़ पर सवार होकर इंद्रलोक से पारिजात वृक्ष ले जाते हुए

​भारतीय पौराणिक कथाओं का सागर अत्यंत विशाल है, और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं तो अनंत हैं। उनकी हर लीला के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य या शिक्षा छिपी होती है। ‘लीला पुरुषोत्तम भगवान’ जैसी पवित्र पुस्तकों में वर्णित ऐसी ही यह एक रोचक और रोमांचक कथा।

​यह कथा उस समय की है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस भौमासुर (जिसे नरकासुर भी कहा जाता है) का वध किया था। इस विजय के तुरंत बाद एक ऐसी घटना घटी, जिसने देवराज इंद्र के अहंकार को चूर-चूर कर दिया। यह कथा है देवी सत्यभामा की एक ज़िद, एक दिव्य ‘पारिजात पुष्प’, और स्वर्ग में हुए एक महासंग्राम की।

​भौमासुर (नरकासुर) का वध और इंद्रलोक आगमन

​प्राग्योतिषपुर के राजा भौमासुर (नरकासुर) का अत्याचार तीनों लोकों में बढ़ गया था। उसने देवताओं की माता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और 16,000 राजकुमारियों को बंदी बना रखा था। देवराज इंद्र की प्रार्थना पर, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर भौमासुर पर आक्रमण किया।
​एक भीषण युद्ध के बाद, श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से भौमासुर का वध कर दिया। उन्होंने सभी राजकुमारियों को मुक्त कराया और माता अदिति के कुंडल वापस प्राप्त किए। इन कुंडलों को वापस लौटाने और विजय का समाचार देने के लिए, श्रीकृष्ण और सत्यभामा अमरावती (इंद्र की राजधानी) पहुंचे, जहां इंद्र और अन्य देवताओं ने उनका भव्य स्वागत किया।

​सत्यभामा का मोह और पारिजात की सुगंध

कुंडल लौटाने के बाद जब श्रीकृष्ण तथा सत्यभामा इन्द्र की राजधानी से वापस लौटने वाले थे। तभी देवी सत्यभामा की दृष्टि एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक पौधे पर पड़ी। यह ​इंद्रलोक के दिव्य उद्यान ‘नंदनवन’ का कोई साधारण पौधा नहीं था, यह समुद्र मंथन से निकला ‘पारिजात’ वृक्ष (कल्पवृक्ष) था। इसके पुष्पों की दिव्य सुगंध ने सत्यभामा का मन मोह लिया। इन पुष्पों की यह विशेषता थी कि वे कभी मुरझाते नहीं थे।

उस समय सत्यभामा को याद आया कि श्रीकृष्ण ने उन्हें पारिजात पुष्प का पौधा देने का वचन दिया था। श्रीकृष्ण और सत्यभामा गरुड़ पर सवार होकर स्वर्ग आये थे। इस अवसर का लाभ उठाकर, सत्यभामा ने पारिजात का एक पौधा उखाड़ लिया और उसे गरुड़ की पीठ पर रख लिया।

​सत्यभामा, जो अपने स्वाभिमान और श्रीकृष्ण के प्रति अधिकार भाव के लिए जानी जाती थीं, ने तुरंत श्रीकृष्ण से हठ कर लिया। उन्होंने कहा, “हे प्राणनाथ! यह पुष्प तो भूलोक पर होना चाहिए। मैं चाहती हूँ कि आप इस पारिजात पुष्प को द्वारका ले चलें, ताकि यह मेरे महल के आंगन की शोभा बढ़ा सके।”

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं इसी प्रकार होती है। वे अपनी पत्नियों (भक्तों) की इच्छा पूरी करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उन्होंने सत्यभामा की बात मान ली। सत्यभामा को यह पुष्प इसलिए भी चाहिए था क्योंकि नारदजी ने एक बार पारिजात का एक पुष्प ले जाकर श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणीदेवी को दिया था। इस कारण सत्यभामा में हीनता की भावना विकसित हो गई थी और वह भी श्रीकृष्ण से एक पारिजात पुष्प प्राप्त करना चाहती थीं। श्रीकृष्ण अपनी सह-पत्नियों के प्रतियोगितापूर्ण स्त्रियोचित स्वभाव को समझ सकते थे, अतः वे मुस्कुराए। उन्होंने तत्काल सत्यभामा से प्रश्न किया, “तुम केवल एक पुष्प क्यों मांग रही हो ? मैं तुम्हें पारिजात पुष्पों का एक पूर्ण वृक्ष देना चाहूँगा।”

वस्तुतः श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा को अपने साथ इसी प्रयोजन से ले गए थे कि वे स्वयं अपने हाथों से पारिजात ले सकेंगी।

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​श्रीकृष्ण की लीलाएं और इंद्र के बीच महासंग्राम

जब पारिजात के पौधे को गरुड़ पर रखा गया था उसी समय नंदनवन के रक्षकों ने देवराज इंद्र को इस बात की सूचना प्रदान कर दी थी। इन्द्र सहित स्वर्ग के सभी नागरिक अत्यन्त क्रोधित हो गए। उनकी अनुमति के बिना ही सत्यभामा ने अप्राप्य पारिजात का पौधा उखाड़ लिया था। अपनी संपत्ति और स्वर्ग के अधिकार के मद में चूर इंद्र को यह सहन नहीं हुआ कि कोई मृत्युलोक का वासी (भले ही वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हों) उनके प्रिय पौधे को ले जाए।

​इंद्र ने तुरंत अपनी देव सेना को एकत्रित किया और श्रीकृष्ण को रोकने के लिए आ पहुंचे। इंद्र ने क्रोधित होकर कहा, “हे कृष्ण! आप देवताओं की वस्तु को बिना अनुमति धरती पर नहीं ले जा सकते। इसे तुरंत वापस रख दें, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।”

अन्य देवताओं सहित इन्द्र ने श्रीकृष्ण तथा सत्यभामा के द्वारा उस पौधे को ले जाने का विरोध किया। किन्तु अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण भी दृढ़ व कठोर बन गए, अतएव देवताओं तथा श्रीकृष्ण के मध्य युद्ध हुआ। सदा की भाँति श्रीकृष्ण विजयी हुए। ​इंद्र का अहंकार टूट गया। उन्होंने लज्जित होकर भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और पारिजात वृक्ष को द्वारका ले जाने की अनुमति दे दी।

पारिजात का द्वारका आगमन

अपनी पत्नी के द्वारा चुने गए पारिजात के पौधे को श्रीकृष्ण गौरव सहित पृथ्वीलोक में द्वारका ले आए। इसके पश्चात् पौधे को सत्यभामा के महल के उद्यान में लगा दिया गया। इस असामान्य वृक्ष के कारण सत्यभामा का उद्यान-भवन असामान्य रूप से सुन्दर बन गया। जब पारिजात का पौधा पृथ्वीलोक पर आया, तब उसकी सुगंध भी आई और उसकी सुगंध और मधु की खोज में स्वर्ग के राजहंस भी पृथ्वी पर उतर आए।

श्रील शुकदेव गोस्वामी जैसे महान् सन्तों ने श्रीकृष्ण के प्रति इन्द्र के व्यवहार की निंदा की है। इन्द्र की माता के कुण्डल भौमासुर ने हर लिए थे। अपनी अहैतुकी कृपा के कारण ही श्रीकृष्ण वो कुंडल इन्द्र को देने के लिए स्वर्गलोक अमरावती पहुँचे थे और इन्द्र उन कर्णफूलों को प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। किन्तु जब पुष्प का एक पौधा श्रीकृष्ण ने स्वर्गलोक से ले लिया, तो इन्द्र युद्ध करने को तत्पर हो गए। यह इन्द्र का स्वार्थ था। श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शीश झुकाकर उसने स्तुति की, किन्तु जैसे ही इंद्र का प्रयोजन सिद्ध हो गया, वह पुरी तरह बदल गए। भौतिकतावादी मानवों का व्यवहार इसी प्रकार का होता है। भौतिकतावादी मानव सदैव अपने ही लाभ में रुचि रखते हैं। इस प्रयोजन से वे किसी का भी किसी भी प्रकार से सम्मान कर सकते हैं, किन्तु जब उनका व्यक्तिगत लाभ पूर्ण हो जाता है, तब उनकी मैत्री भी समाप्त हो जाती है।

​यह कथा दिखाती है कि भगवान अपने भक्तों की छोटी से छोटी इच्छा भी पूरी करते हैं, जैसा उन्होंने सत्यभामा के लिए किया। साथ ही, यह प्रसंग यह भी दर्शाता है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो (जैसे देवराज इंद्र), भगवान श्रीकृष्ण के सामने अहंकार का कोई स्थान नहीं है।

By Mayank Dubey

मयंक एक बहुआयामी लेखक, विचारशील कंटेंट क्रिएटर और युवा विचारक हैं एवं "मन की कलम" नामक हिंदी कविता संग्रह के प्रकाशित लेखक हैं। वे धर्म, भारतीय संस्कृति, भू-राजनीति और अध्यात्म जैसे विषयों में भी लिखते है। अपने यूट्यूब चैनल और डिजिटल माध्यमों के ज़रिए वे समय-समय पर समाज, सनातन संस्कृति और आत्मविकास से जुड़े विचार प्रस्तुत करते हैं।

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