जब हम नवरात्रि का नाम सुनते हैं, तो अक्सर चैत्र नवरात्रि या शारदीय नवरात्रि का ही ध्यान आता है, जिनमें देवी के नौ स्वरूप जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है, सार्वजनिक रूप से पूजे जाते हैं। किंतु सनातन धर्म में एक ऐसा भी काल आता है, जो बाहरी उत्सव से नहीं, बल्कि अंतर की यात्रा से जुड़ा होता है। इसे ही गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।
एक श्रद्धालु के रूप में अगर अनुभव किया जाए तो गुप्त नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर शक्ति को जाग्रत करने का उत्तम अवसर है।
गुप्त नवरात्रि कब आती है?
सनातन पंचांग के अनुसार गुप्त नवरात्रि वर्ष में दो बार आती है। एक बार माघ माह में और दूसरी बार आषाढ़ माह में।
इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि 19 जनवरी प्रतिपदा से 27 जनवरी नवमी तक रहेगी। साधना के रूप में इन नौ दिनों में आप मौन धारण कर सकते है। विभिन्न साधनाओं में से यह भी एक साधना होती है जिसे साधक करते हैं। इसी के साथ मंत्र जप, आत्मचिंतन और शक्ति उपासना के लिए भी यह नौ दिन अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं।
गुप्त नवरात्रि को गुप्त क्यों कहा गया है?
साधना के पथ पर चलने वाले यह जानते हैं कि उपासना बाहरी दिखावे के लिए नहीं होती। साधना जितनी गुप्त और संयमित रखी जाए, वह उतना ही अधिक आध्यात्मिक बल प्रदान करती है।
गुप्त नवरात्रि को गुप्त इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें साधना व्यक्तिगत और अंतर्मुखी होती है। प्रत्यक्ष उत्सवों की बजाय इस विशेष पर्व पर आंतरिक शुद्धि पर अधिक जोर दिया जाता है। यह काल साधक और शक्ति के बीच निजी संवाद का होता है।
शक्ति उपासना और तंत्र साधना का पर्व
गुप्त नवरात्रि का यह समय विशेष रूप से तंत्र, मंत्र और दश महाविद्या साधना से जुड़ा होता है। दश महाविद्या माँ शक्ति के दस उग्र स्वरूप हैं, जिनकी उपासना सात्त्विक अथवा तामसिक तंत्र पद्धतियों द्वारा की जाती है।
साधक अपने गुरु के सानिध्य में ही, इन नौ दिनों तक दश महाविद्याओं की गूढ़ साधना करते हैं। यह एक संदेश है कि शक्ति को बाहर नहीं, अपने भीतर खोजना चाहिए।
दश महाविद्या: शक्ति के दस गूढ़ स्वरूप
गुप्त नवरात्रि का मूल केंद्र दश महाविद्याएँ हैं। दश महाविद्याएँ माँ शक्ति के वे दस स्वरूप हैं, जो जीवन के प्रत्येक आयाम भय, ज्ञान, त्याग, वैराग्य, सौंदर्य और समृद्धि को संतुलित करते हैं। एक श्रद्धालु के रूप में इन्हें देवी के केवल रूप नहीं, बल्कि चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ मानना चाहिए।
माँ काली : काल और अज्ञान का नाश करने वाली आद्य शक्ति हैं। माँ काली की साधना भय को तोड़ती है और साधक को सत्य के सामने खड़ा करती है।
माँ तारा : माँ ज्ञान, करुणा और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाली देवी हैं। माँ तारा की साधना साधक को आंतरिक मार्गदर्शन प्रदान करती है।
माँ त्रिपुरसुंदरी: जिन्हें षोडशी भी कहा जाता है, सौंदर्य, संतुलन और पूर्णता का स्वरूप हैं। माता षोडशी की साधना जीवन में सामंजस्य और संतुलन लाती है।
माँ भुवनेश्वरी: संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी उपासना चेतना के विस्तार का बोध कराती है।
माँ छिन्नमस्ता: त्याग और आत्मनियंत्रण की देवी हैं। अक्सर यह स्वरूप लोगों को भयावह लगता है, परंतु यह करुणा, त्याग और स्नेह का प्रतीक है। इनकी साधना अहंकार को काटने का बोध कराती है।
माँ धूमावती: वैराग्य और तपस्या का स्वरूप हैं। यह महाविद्या जीवन की कठोर सच्चाइयों को स्वीकारना सिखाती है।
माँ बगलामुखी: स्तंभन शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। मान्यता है कि इनकी साधना से वाणी और विचारों पर नियंत्रण तथा वाक् सिद्धि की प्राप्ति होती है।
माँ मातंगी: ज्ञान, कला और वाणी की देवी हैं। इन्हें तंत्र की सरस्वती भी कहा जाता है। इनकी साधना रचनात्मक बुद्धि को जाग्रत करती है।
माँ कमला: समृद्धि और संतुलित भौतिक जीवन की प्रतीक हैं। इनकी साधना से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा यह सिखाती है कि धन भी साधना का अंग हो सकता है।
माँ त्रिपुर भैरवी: साहस और शौर्य की प्रतीक हैं। इनकी साधना से भय का नाश होता है और जीवन में निर्भीकता का संचार होता है।
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तंत्र साधना: भय या बोध?
आज तंत्र शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियाँ हैं परंतु एक साधक जानता है कि तंत्र का वास्तविक अर्थ विधि के माध्यम से चेतना का विस्तार है। अलग-अलग तंत्रो साधनाओं का फल भी भिन्न रहता है। इससे समझा जा सकता है कि तंत्रों के कुछ प्रकार होते है।
सनातन तंत्र की कुछ प्रमुख धाराएँ इस प्रकार हैं:
दक्षिणाचार तंत्र: यह तंत्र साधना सात्त्विक, संयमित और गृहस्थ साधकों के लिए उपयुक्त मार्ग है। यह मंत्र, ध्यान और शुद्ध आचरण पर आधारित है।
वामाचार तंत्र: प्रतीकों और अनुशासन का मार्ग है। इसका उद्देश्य इंद्रियों पर विजय पाना है, न कि उनका भोग।
कौल तंत्र: शक्ति और शिव के ऐक्य का गूढ़ मार्ग है। दश महाविद्या साधना इसमें विशेष महत्व रखती है।
श्रीकुल तंत्र: माँ त्रिपुरसुंदरी और श्री विद्या से संबंधित मार्ग है। यह सौंदर्य, संतुलन और उच्च चेतना की साधना है।
कालिकुल तंत्र: यह माँ काली केंद्रित साधना का मार्ग है। इसे अहंकार और भय के पूर्ण विसर्जन का मार्ग भी कहा जाता है।
गुप्त नवरात्रि: श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष अवसर
अगर आप किसी प्रकार की गहरी साधना नहीं कर सकते तो इस गुप्त नवरात्रि आपको कुछ इस तरह के प्रयास अवश्य करना चाहिए जैसे कम बोलना, अधिक सुनना और भीतर उतरना। यह समय हमें सिखाता है कि शक्ति बाहर नहीं, हमारे भीतर जाग्रत होने की प्रतीक्षा कर रही है। गुप्त माघ नवरात्रि कोई प्रदर्शन का पर्व नहीं, बल्कि साधना का मौन उत्सव है। दश महाविद्याएँ और तंत्र परंपरा सनातन धर्म की उसी गहराई को दर्शाती हैं, जहाँ साधक अपने भीतर की शक्ति से साक्षात्कार करता है।
यदि श्रद्धा है, संयम है और विवेक है,
तो गुप्त नवरात्रि साधना का द्वार स्वयं खुल जाता है।
