मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग यात्रा

सनातन परंपरा में प्रतिष्ठित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का विशेष स्थान है। विगत वर्ष आषाढ़ माह में मुझे इस पावन धाम के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और सच कहूँ तो श्रीशैलम की यह यात्रा केवल एक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि मेरे जीवन का एक गहन आध्यात्मिक अनुभव बन गई।
यह दिव्य ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में स्थित नल्लमाला पर्वतमाला के श्रीशैल पर्वत पर विराजमान है। चारों ओर फैली हरियाली, ऊँचे-ऊँचे पर्वत और समीप बहती कृष्णा नदी की पवित्र सहायक धारा ‘पातालगंगा’ यह सब मिलकर वातावरण को अद्भुत रूप से आध्यात्मिक बना देते हैं।

श्रीशैलम केवल एक शैव तीर्थ नहीं है, बल्कि यह 18 महाशक्तिपीठों में से भी एक है। मान्यता है कि यहाँ माता सती की ग्रीवा (गर्दन) का पतन हुआ था और देवी यहाँ भ्रामराम्बा के रूप में पूजित हैं। इसी कारण इस पावन धाम को श्रद्धा से “दक्षिण का कैलाश” कहा जाता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और पौराणिक कथा

शिव पुराण की कोटिरुद्रसंहिता में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव की अत्यंत भावपूर्ण कथा वर्णित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने पुत्रों कार्तिकेय और गणेश के विवाह का निर्णय लिया। यह निश्चय हुआ कि जो पहले संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, उसी का विवाह पहले संपन्न होगा।
कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता को ही संपूर्ण ब्रह्मांड मानते हुए उनकी सात परिक्रमाएँ कर लीं। परिणामस्वरूप गणेश जी का विवाह ऋद्धि और सिद्धि से कर दिया गया।
जब कार्तिकेय लौटे और यह दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुःखी होकर दक्षिण दिशा में क्रौंच पर्वत की ओर चले गए। भगवान शिव और माता पार्वती उन्हें मनाने पहुँचे, किंतु पुत्र-वियोग की पीड़ा में अंततः दोनों ने उसी क्षेत्र में ज्योति स्वरूप में निवास करने का संकल्प लिया। यही स्थल आगे चलकर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

“मल्लिकार्जुन” नाम का आध्यात्मिक अर्थ

“मल्लिकार्जुन” नाम दो शब्दों से मिलकर बना है। “मल्लिका” चमेली का पुष्प, जिससे माता पार्वती ने भगवान शिव की पूजा की, “अर्जुन” उज्ज्वल, श्वेत और पवित्र। भगवान शिव का एक नाम। इन दोनों के संयुक्त रूप से भगवान शिव “मल्लिकार्जुन” कहलाए।

शास्त्रों और पुराणों में मल्लिकार्जुन का उल्लेख

श्रीशैलम और भगवान मल्लिकार्जुन की महिमा अनेक प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है:
महाभारत (वन पर्व) में श्रीशैल पर्वत पर शिव दर्शन को महान यज्ञों के समान फलदायी बताया गया है। शिव पुराण में स्पष्ट उल्लेख है “श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्”।
स्कंद पुराण में “श्रीशैल खंड” नामक विस्तृत भाग है, जिसमें इस क्षेत्र की तीर्थ-महिमा, साधना और शिव-भक्ति का वर्णन मिलता है।
वैदिक साहित्य में प्रत्यक्ष उल्लेख भले न हो, पर उत्तरवैदिक और पुराणिक परंपरा में इसकी महिमा पूर्णतः प्रतिष्ठित है।

लीला कल्याणम: शिव-शक्ति के दिव्य मिलन का साक्षी

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और पौराणिक कथा

मल्लिकार्जुन मंदिर की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक है “लीला कल्याणम”। अपने सौभाग्य से मुझे इस दिव्य आयोजन का प्रत्यक्ष साक्षी बनने का अवसर मिला।
यह उत्सव भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी और माता भ्रामराम्बा के दिव्य विवाह का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह केवल विवाह नहीं, बल्कि पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा) के मिलन का दर्शन है। एक विशेष मान्यता यह भी है कि इस विवाह में स्वयं कार्तिकेय साक्षी होते हैं।
महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित ब्रह्मोत्सवम में लीला कल्याणम प्रमुख अनुष्ठान होता है। मान्यता है कि इसके दर्शन से वैवाहिक बाधाएँ दूर होती हैं और मन को गहन शांति प्राप्त होती है।

स्थानीय लोककथा: राजकुमारी चंद्रवती की अद्भुत भक्ति

श्रीशैलम से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, राजकुमारी चंद्रवती ने सांसारिक वैभव त्यागकर यहीं तपस्या आरंभ की। उन्होंने देखा कि उनकी एक गाय प्रतिदिन एक विशेष पत्थर पर अपना संपूर्ण दूध अर्पित करती है।
जब उस स्थान की खुदाई की गई, तो वहाँ से स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। उसी स्थान पर भगवान शिव का मंदिर निर्मित किया गया। आज भी कदली वन और पातालगंगा को इस कथा से जोड़ा जाता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का आध्यात्मिक महत्व और दर्शन फल

लोकमान्यता है कि अमावस्या को भगवान शिव और पूर्णिमा को माता पार्वती यहाँ कार्तिकेय से मिलने आते हैं। श्रद्धा और भक्ति से श्रीशैल शिखर के दर्शन करने वाला भक्त मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। यह विश्व के अत्यंत दुर्लभ तीर्थों में से एक है, जहाँ ज्योतिर्लिंग और महाशक्तिपीठ एक ही परिसर में स्थित हैं।

क्यों हर सनातनी को श्रीशैलम अवश्य जाना चाहिए

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि यह शिव के वैराग्य और माता पार्वती की करुणा का दिव्य संगम है। यहाँ आकर मैंने भक्ति, शांति और आत्मिक संतुलन तीनों का एक साथ अनुभव किया। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह पावन धाम आपकी आध्यात्मिक यात्रा को नई ऊँचाइयों तक ले जाता है। श्रीशैलम के दर्शन से जो शांति मुझे प्राप्त हुई, वह आज भी मेरे हृदय में बसी हुई है।

जीवन में प्रत्येक सनातनी को “दक्षिण के कैलाश” श्रीशैलम के दर्शन अवश्य करने चाहिए, ताकि आत्मा को नई ऊर्जा और जीवन को नई दिशा मिल सके।

By मयूर सोनी

विज्ञान के छात्र, कर्मयोग के राही। इंजीनियर | लेखक | गौरवान्वित सनातनी अपनी जड़ों से गहरा लगाव रखने वाले एक ऐसा जिज्ञासु, जो भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को अपनी लेखनी का आधार मानते है। पेशे से मयूर एक इंजीनियर है जो 'कर्मयोग' के सिद्धांत में विश्वास रखते है। उनका मानना है कि हमारी प्राचीन परंपराओं में आधुनिक समस्याओं के गहरे समाधान छिपे हैं। भारत की मिट्टी और सनातन धर्म के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा के साथ, वे अपने विचार विश्व तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध रहते है।

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