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सब कुछ रिस्की है: जीवन में जोखिम की अनिवार्यता और अध्यात्म का दृष्टिकोण

जीवन में जोखिम की अनिवार्यता और अध्यात्म का दृष्टिकोण दर्शाता चित्र

हर्षद मेहता के जीवन पर बनी वेब सीरीज़ ‘स्कैम 1992’ का एक डायलॉग बहुत चर्चित हुआ था- “रिस्क है तो इश्क़ है।” यदि हम उस पूरी वेब सीरीज़ या हर्षद मेहता के वास्तविक जीवन का विश्लेषण करें, तो हम पाएंगे कि उनकी शुरुआत से लेकर अंत तक, वे सदैव जोखिमों (risks) के साथ खेलते रहे। यह डायलॉग सिर्फ़ एक आर्थिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह जीवन की एक गहरी हकीकत को बयां करता है, जिसे अक्सर हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

बचपन से जोखिम मुक्त परवरिश

विडंबना यह है कि बचपन से ही हमें जोखिमों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हमारी पूरी परवरिश कुछ इस तरह से होती है कि हमारे दिमाग में ‘सुरक्षा’ (security) का विचार घर कर जाए। हमारे माता-पिता को सदैव हमारी चिंता होती है और वे हमें हर संभावित परेशानी से बचाना चाहते हैं। इसलिए, उनका हमारे लिए सुझाव हमेशा एक ‘सुरक्षित और जोखिम मुक्त’ रास्ते पर चलने का होता है।

मध्यवर्गीय मानसिकता और ‘सुरक्षा’ का भ्रम

असल जीवन माता-पिता के सुझावों से पूर्णतः विपरीत होता है, विशेषकर एक भारतीय मध्यवर्गीय परिवार के लिए। एक मध्यवर्गीय परिवार में सीमित संसाधन, भारी जिम्मेदारियां, पारिवारिक और सामाजिक दबाव होता है। सीमित बजट में जीवन जीने की चुनौती के साथ-साथ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं भी होती हैं।

ऐसी स्थिति में, एक ‘जोखिम मुक्त’ प्रयास कई बार प्रगति में बाधा की तरह काम कर सकता है। यह व्यक्ति को एक ऐसी ‘लूप’ (loop) में फंसा देता है, जहाँ वह सुरक्षा के नाम पर अपनी प्रतिभा और अवसरों का गला घोंट देता है।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ मध्यवर्गीय परिवार ही जोखिमों से बचता है। संसार का हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रास्ते पर ही चलना चाहता है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक हमारा प्रयास होता है कि जीवन में आने वाले जोखिमों को हम दूर रखें। लेकिन समझने वाली बात यह है कि किसी एक व्यक्ति के लिए जो ‘रिस्क’ है, वह दूसरे के लिए एक ‘अवसर’ (opportunity) हो सकता है।

उद्देश्यपूर्ण जोखिम की परिभाषा

मनुष्य द्वारा लिए गए किसी भी प्रकार के जोखिम के पीछे एक उद्देश्य होता है। जोखिम कई प्रकार के होते हैं: आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक, वैज्ञानिक या रोमांचक (adventure) आदि।

जोखिम लेते समय व्यक्ति अपना कुछ न कुछ दांव पर लगाता है और उससे बेहतर परिणाम की कल्पना करता है। कई बार वह कल्पना साकार होती है, तो कई बार परिणाम विपरीत आकर बुरा हाल कर देते हैं। इसलिए जोखिमों से बचने को कहा जाता है। मगर क्या हो, जब आपको पता चले कि आपका हर पल जोखिमों से भरा हुआ है? हर रोज़ आपके किसी भी विपदा से बचने के फैसले, आपकी विपदाओं में फंसने की संभावना को कम नहीं करते।

जोखिम क्या है? (Calculated vs. Blind Risk)

कुछ लोगों के लिए जोखिम सिर्फ़ सट्टा है, तो कुछ के लिए यह एक गणनात्मक निर्णय (calculated decision) है।

असल में, एक जोखिम वह कदम है जिसका परिणाम बाहरी, भीतरी, सामाजिक, आर्थिक, भूगोलिक, राजनीतिक आदि स्थितियों और कारणों से बदल सकता है। भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है, और यही अनिश्चितता हर कदम को एक जोखिम बना देती है।

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जीवन पूर्ण रूप से जोखिम भरा है

जन्म से लेकर मृत्यु तक, हम हर रोज़ अनेकों प्रकार के जोखिमों से जूझते हुए जीवन जी रहे हैं। इसमें सबसे बड़ा जोखिम स्वयं हमारे जीवन का है। इसी आधार पर कहा जाता है कि जीवन अनिश्चित है। व्यक्ति दशकों की योजना बनाता है, परंतु उस योजना के शुरू होने से पहले ही अचानक उस व्यक्ति के जीवन की घड़ी रुक सकती है। भले ही यह विचार साधारण लगे, जो सबको मालूम हो, मगर यही विचार मोक्ष प्राप्ति एवं जीवन में शांति का आधार है। जब आप इस परम अनिश्चितता को स्वीकार कर लेते हैं, तो भय समाप्त हो जाता है।

उदाहरण: सुरक्षा का ढोंग और छिपे हुए जोखिम

एक पिता अपनी बेटी के पसंद के लड़के से विवाह इसलिए नहीं करवाता क्योंकि लड़के की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। चूँकि दुनिया में भावनाओं से ज़्यादा रुतबा (status) काम करता है, तो पिता अपनी बेटी का विवाह किसी दूसरे संपन्न लड़के से करवा देता है ताकि आर्थिक जोखिमों को ख़त्म किया जा सके। मगर क्या सारे जोखिम खत्म हो गए?

क्या उस लड़की का जीवन अब पूरी तरह उलझन मुक्त हो गया?

आप जानते हैं— बिल्कुल नहीं।

वह संपन्न लड़का उस लड़की की सोच और समझ से बिल्कुल अलग हो सकता है। उसका चरित्र पूर्णतः अलग हो सकता है, या उसकी दुनिया झूठी हो सकती है। हम एक त्रुटि (error) को ठीक करते हुए अनेक प्रकार की नई त्रुटियों को जन्म दे देते हैं। हमारे उदाहरण में, जिस लड़के के हालात ठीक नहीं थे, उसके लिए भविष्य की अपार संभावनाएं इंतज़ार कर रही थीं।

संभावनाएं हर जगह हैं: हर पल, हर रोज़

कोख में पल रहा एक बच्चा, जिसका परिवार मात्र नौ महीने नहीं बल्कि कई सालों से इंतज़ार कर रहा था, वह अपंग पैदा हो सकता है। या बड़ा होकर परिवार एवं समाज का विरोधी बन सकता है। ऐसी हज़ारों संभावनाएं हैं और यही संभावनाएं हमारे जीवन के साथ भी लगातार चल रही हैं। हर रोज़, हर पल। वैसे ही नौकरी में भी कभी भी निकाल दिए जाने का ख़तरा है। किसी बड़े धंधे वाले का काम ठप पड़ सकता है। ‘रिस्क’ हर जगह है। हर जगह….. भविष्य हम नहीं जानते, बस हम कल्पना करते हैं।

कदम उठाने से मत डरिए: पर ‘बेवकूफी’ न करें

जब किसी भी चीज़ को करने में जोखिम है, तो क्यों न बेहतर संभावनाओं और प्रयासों के साथ हम वह करें जिससे हमारा जीवन का उद्देश्य पूरा हो? ‘रिस्क’ को कम करने के लिए आपको प्रयास करना चाहिए, न कि हमेशा सुरक्षा की ओर देखना चाहिए।

आपको यह बात अपने दिमाग से हटा ही देनी चाहिए कि ‘मैं रिस्क नहीं ले सकता!’ क्योंकि अगर आपकी सांसें चल रही हैं, चेतना के स्तर के साथ आप जी रहे हैं, तो आप जोखिमों के बीच में ही हैं।

हालाँकि, इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि आप जो काम कर रहे हैं वह जोखिम भरा हो सकता है, मगर बेवकूफी भरा नहीं। जोखिम लेने और बेवकूफी करने के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है, जिसे नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है। जोखिम का अर्थ है ‘Calculated Risk’, जहाँ आप संभावित नुकसान और लाभ का आंकलन करते हैं।

जोखिम और अध्यात्म का मार्ग

बाहरी दुनिया की स्थिति कभी उत्तम नहीं होती। अनेकों कारणों की वजह से इनमें लगातार बदलाव आता है, जिसका प्रभाव हमारे निर्णयों पर पड़ता है। मगर भीतर की बात कुछ और होती है।

आध्यात्मिक व्यक्ति बाहरी हालातों से ज़्यादा खुद को वैसा बनाता है जैसा उसे होना चाहिए। अगर आप भीतर की ओर मुड़े हुए हैं, तो बाहरी परिस्थिति कैसी भी हो, आप स्थिरता के साथ अपने कदम बढ़ाएंगे। अध्यात्म आपको वह ऊर्जा देता है जिससे आप तमाम जोखिमों के लिए तैयार होते हैं, क्योंकि आपको पता है कि जीवन का मूल सत्य क्या है। अध्यात्म आपको सिखाता है कि आप सिर्फ़ यह शरीर नहीं हैं, बल्कि एक चेतन सत्ता हैं।

तो भीतर देखिए, आपका शरीर एक जटिल मशीन है जिसमें लाखों छोटे-बड़े उपकरण लगे हुए हैं। इसका चलना ही अपने आप में एक बड़ा चमत्कार और जोखिम है। इसे स्वीकार करें और अपने जीवन के उद्देश्य की ओर बिना भय के कदम बढ़ाएँ।

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