सनातन परंपरा में मुख्य उद्देश्य इस जीवन को अच्छे से जीकर धर्म का पालन करते हुए मुक्ति के मार्ग पर चलना है। मगर इस युग में यह कठिन कार्य है, किंतु मन और मस्तिष्क को शांति प्रदान कर ऐसा किया जा सकता है। भगवान विष्णु की स्तुति में रचा गया ‘श्री हरि स्तोत्रम्’ (Shri Hari Stotram) न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि इसकी लय और शब्द विन्यास मन को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
श्रीमत्परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद जी द्वारा रचित इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में भगवान विष्णु के स्वरूप, उनकी शक्तियों और उनके दिव्य गुणों का वर्णन है।
‘भारत की वाणी‘ का प्रयास है कि इस अद्भुत स्त्रोत का आध्यात्मिक लाभ आप तक पहुँचे और इसके पीछे का अर्थ भी समझ आये। नीचे इस स्तोत्र के सभी 8 श्लोकों का सरल हिंदी एवम अंग्रेजी भाषा में अर्थ दिया गया है ताकि पाठक सिर्फ इनके उच्चारण तक सिमित न रहे और इनके पीछे के भाव को भी अच्छे से समझे।
श्री हरि स्तोत्रम्
श्लोक 1
जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं।
नभोनीलकायं दुरावारमायं सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं॥1॥
शब्दार्थ: जगज्जालपालं (जगत रूपी जाल के रक्षक), चलत्कण्ठमालं (गले में हिलती हुई माला वाले), शरच्चन्द्रभालं (शरद ऋतु के चंद्रमा जैसा मस्तक), महादैत्यकालं।( जो स्वयं असुरों और दैत्यों के काल है।), नभोनीलकायं (आकाश जैसा नीला शरीर), दुरावारमायं (जिनके पास माया की अजय शक्तियां है), सुपद्मासहायम् (माता लक्ष्मी जिनके साथ निवास करती है)।
भावार्थ: मैं उन श्रीहरि का भजन करता हूँ, जो इस संसार रूपी जाल के रक्षक हैं, जिनके गले में सुंदर माला सुशोभित है, जिनका मस्तक शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति चमक रहा है और जो महान दैत्यों के काल हैं। जिनका शरीर आकाश के समान नीला है और जिनकी माया को पार करना अत्यंत कठिन है।
I worship Lord Shri Hari, the protector of the cosmic web of the universe, who wears a swaying garland and whose forehead shines like the autumn moon. He is the destroyer of mighty demons, possesses a sky-blue complexion, and wields a divine illusion (Maya) that is difficult to transcend.
श्लोक 2
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्सन्निवासं शतादित्यभासं।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं॥2॥
शब्दार्थ: सदाम्भोधिवासं (सदैव समुद्र में निवास करने वाले), गलत्पुष्पहासं (जिनके चेहरे पर फूल समान मुस्कान है), जगत्सन्निवासं (जो जगत में हर जगह है), शतादित्यभासं (सौ सूर्यों के समान चमक वाले), गदाचक्रशस्त्रं (गदा और चक्र जैसे शस्त्र जिनके पास है), लसत्पीतवस्त्रं (सुंदर पीले वस्त्रों वाले), हसच्चारुवक्त्रं (जिनकी मुस्कान सौम्य है।)
भावार्थ: जो सदैव क्षीर-सागर में निवास करते हैं, जिनकी मुस्कान खिले हुए फूलों की तरह कोमल है, जो पूरे जगत में व्याप्त हैं और जिनकी आभा सौ सूर्यों के समान है। मैं उन विष्णु का भजन करता हूँ जिन्होंने हाथ में गदा-चक्र धारण किया है और जो सुंदर पीले वस्त्रों में सुशोभित हैं।
I worship Lord Vishnu, who eternally dwells in the cosmic ocean, whose smile is as gentle as blooming flowers, and who resides within all of creation. He shines with the brilliance of a hundred suns, holds the mace and discus, and is adorned in radiant yellow garments.
श्लोक 3
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं जलान्तर्विहारं धराभारहारं।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं ध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं॥3॥
शब्दार्थ: रमाकण्ठहारं (जो माता लक्ष्मी के गले मे माला है), श्रुतिव्रातसारं (वेदों का सार), जलान्तर्विहारं (जो जल के भीतर रहते है।), धराभारहारं (जिन्होंने पृथ्वी का भार हर रखा है।), चिदानन्दरूपं (जिनका स्वरूप परमानंद से परिपूर्ण है), मनोज्ञस्वरूपं (मन को आकर्षित करने वाला रूप), ध्रुतानेकरूपं (जिनके कई स्वरूप है।)
भावार्थ: जो लक्ष्मी जी के गले के हार हैं (उनके प्रिय हैं), जो समस्त वेदों का सार हैं, जो जल (क्षीर सागर) में विहार करते हैं और पृथ्वी का भार हरने वाले हैं। मैं उन श्रीहरि को भजता हूँ जो चित्त को आनंद देने वाले हैं और जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किए हैं।
I worship Lord Hari, the beloved of Goddess Lakshmi and the true essence of all Vedic scriptures. He sports within the cosmic waters and relieves the Earth of its burdens. He is the embodiment of pure consciousness and bliss, appearing in many divine forms.
श्लोक 4
जराजन्महीनं परानन्दपीनंसमाधानलीनं सदैवानवीनं।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं॥4॥
शब्दार्थ: जराजन्महीनं (जो जन्म और मृत्यु से परे है), परानन्दपीनं (जो अनंत सुख से भरे है), समाधानलीनं (जो शांति से परिपूर्ण है और जिनका मन स्थिर रहता है), सदैवानवीनं (हमेशा नवीन प्रतीत होते है), जगज्जन्महेतुं (जो जन्म का कारण है), सुरानीककेतुं (देवो की सेना के रक्षक), त्रिलोकैकसेतुं (जो तीन लोकों में सेतु के समान है)
भावार्थ: जो बुढ़ापे और जन्म के चक्र से मुक्त हैं, जो परम आनंद से पूर्ण हैं, जो सदैव नवीन (युवा) प्रतीत होते हैं। जो इस जगत की उत्पत्ति के कारण हैं, देवताओं की सेना के रक्षक हैं और तीनों लोकों के बीच सेतु (पुल) के समान हैं।
I worship Him who is free from the cycles of birth and old age, full of supreme bliss, and eternally youthful. He is the cause of the universe’s creation, the banner of the celestial armies, and the unique bridge that connects the three worlds.
श्लोक 5
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं।
स्वभक्तानुकूलं जगद्व्रुक्षमूलं निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं॥5॥
शब्दार्थ: कृताम्नायगानं (जो वेदों के गायक है), खगाधीशयानं (पंक्षियों के राजा की सवारी करने वाला), विमुक्तेर्निदानं (मुक्ति प्रदान करने वाले), हरारातिमानं (जिन्होंने दुश्मनों का मान हरा), स्वभक्तानुकूलं (भक्तों के अनुकूल है), जगद्व्रुक्षमूलं (जो जगत वृक्ष की जड़ है), निरस्तार्तशूलं (समस्त दुःखो का संहार करने वाले)
भावार्थ: जिनके गुणों का गान वेदों में किया गया है, जो पक्षियों के राजा गरुड़ पर सवारी करते हैं, जो मुक्ति के अंतिम आधार हैं। जो अपने भक्तों के लिए सदैव दयालु हैं और इस संसार रूपी वृक्ष की जड़ हैं, मैं उन दुखों का नाश करने वाले प्रभु को भजता हूँ।
I worship the Lord whose glories are sung in the Vedas, who travels on the king of birds (Garuda), and who is the source of ultimate liberation. He is ever-compassionate to His devotees, the root of the cosmic tree of existence, and the healer of all miseries.
श्लोक 6
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं जगद्विम्बलेशं ह्रुदाकाशदेशं।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं॥6॥
शब्दार्थ: समस्तामरेशं (समस्त देवो के स्वामी), द्विरेफाभकेशं (जिनके केश का रंग बड़ी काली मधुमक्खी के जैसा है), जगद्विम्बलेशं (पृथ्वी को अपना कण मानने वाला), ह्रुदाकाशदेशं (जिनके पास आकाश जैसा स्पष्ट शरीर है), सदा दिव्यदेहं (दिव्य देह वाले), विमुक्ताखिलेहं (भौतिक मोहो से मुक्त करने वाले), सुवैकुण्ठगेहं (बैकुंठधाम जिनका घर है)
भावार्थ: जो समस्त देवताओं के स्वामी हैं, जिनके बाल भंवरे के समान काले हैं, जिनका निवास हृदय रूपी आकाश में है। जिनका शरीर दिव्य है और जिनका निवास स्थान सुंदर वैकुण्ठ धाम है।
I worship Lord Hari, the ruler of all immortals, whose hair is dark as a swarm of bees and who dwells in the vast sky of the heart. He possesses a divine form free from worldly desires and resides in the magnificent abode of Vaikuntha.
श्लोक 7
सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं॥7॥
शब्दार्थ: सुरालिबलिष्ठं (सभी देवों में बलवान), त्रिलोकीवरिष्ठं (जो तीन लोको में वरिष्ठ है), गुरूणां गरिष्ठं (जो गुरुओं के गुरु है), स्वरूपैकनिष्ठं (अपने स्वरूप में स्थिर), सदा युद्धधीरं (युद्ध मे सदैव विजय होने वाले), महावीरवीरं (जो वीरो के वीर है), महाम्भोधितीरं (विशाल समुद्र के किनारे पर)
भावार्थ: जो देवताओं में सबसे शक्तिशाली हैं, तीनों लोकों में श्रेष्ठ हैं, गुरुओं के भी गुरु हैं। जो युद्ध में धीर हैं, वीरों के भी वीर हैं और सागर के तट पर (जगन्नाथ या क्षीर सागर) निवास करते हैं।
I worship the most powerful among gods, the supreme being of the three worlds, and the greatest of all teachers. He is the bravest of heroes, steadfast in battle, and resides on the shores of the great cosmic ocean.
श्लोक 8
रमावामभागं तलानग्रनागं कृताधीनयागं गतारागरागं।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं॥8॥
शब्दार्थ: रमावामभागं (माँ लक्ष्मी को अपनी बाई ओर रखते है), तलानग्रनागं (जो नग्र नाग पर विराजमान है), कृताधीनयागं (भक्ति एवम ध्यान से प्राप्त किए जाने वाले), गतारागरागं (जो सभी प्रकार के सांसारिक मोहो से मुक्त हैं और जिनकी भक्ति से मोह मुक्त हुआ जाता है।), मुनीन्द्रैः सुगीतं (संतों के लिए शुद्ध संगीत), सुरैः संपरीतं (जिनकी सेवा सारे देव करते हैं), गुणौधैरतीतं ( जो सर्व गुणों से परे हैं)
भावार्थ: जिनके बाईं ओर देवी लक्ष्मी विराजमान हैं, जो शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं। जिनकी स्तुति श्रेष्ठ मुनियों द्वारा की जाती है और जो गुणों की सीमा से परे (गुणातीत) हैं, मैं उन श्रीहरि का भजन करता हूँ।
I worship Lord Hari, on whose left side Goddess Lakshmi resides and who rests upon the great serpent Shesha. He is praised by the king of sages, surrounded by gods, and stands beyond the reach of material qualities.
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फलश्रुति
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारेः। स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो॥9॥
जो मनुष्य एकाग्र चित्त होकर भगवान मुरारी के इस अष्टक का पाठ करता है, वह शोक से रहित होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है और उसे दोबारा इस जन्म-मृत्यु के चक्र में दुःख नहीं भोगना पड़ता।
One who recites this ‘Hari Stotram’ daily with a focused mind will attain the sorrowless abode of Lord Vishnu and will never again suffer the grief of the cycle of birth and death.
हरिनाम स्तोत्र का ध्यान से जाप करने पर आध्यात्मिक शांति का अनुभव मिलता है। प्राचीन ग्रंथों एवम पुराणों में लिखित सहित अन्य दिव्य मंत्रो को बनाया ही ऐसा गया है कि ध्वनि की ऊर्जा का सही उपयोग करने पर चमत्कार घटित होते है। प्रति दिन इसका पाठ करने पर आपको मानसिक स्तर पर इसका प्रभाव निश्चित ही समझ आएगा।
