उज्जैन से बाबा महाकाल का जब बुलावा आता है तो जाना निश्चित रहता है। उज्जैन जैसे पवित्र स्थान न सिर्फ़ आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते है बल्कि मन को आनंद से परिपूर्ण कर देते है।
यह सिर्फ एक टूर नहीं होता पर एक ऐसी यात्रा होती है जिसमें श्रद्धा, शांति, थकान, सुकून – सब कुछ एक साथ महसूस होता है।
मंदिर के पास ठहरने का सुकून
धार्मिक नगरी उज्जैन पहुँचते ही ऐसा लगा मानो आवोहवा ही बदल गयी हो। हालांकि जैसे-जैसे हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही थी सड़क की चौड़ाई कम होती जा रही थी। मगर सबसे बड़ी राहत की बात थी कि हमारा होटल – होटल सतयुग – महाकाल मंदिर के बिल्कुल पास था। मंदिर तक पहुँचने के लिए न ऑटो की चिंता, न ट्रैफिक का तनाव, बस हल्के कदमों से पैदल चलकर कुछ ही मिनटों में महाकाल मंदिर पहुँचा जा सकता था।
होटल से मंदिर तक की पैदल दूरी ने यात्रा को बेहद आसान और आरामदायक बना दिया। यही कारण था कि हम दो से तीन बार मंदिर बड़े आराम से चले गए क्योंकि मंदिर और हमारे होटल की दूरी मुश्किल से कुछ मिनटों की थी। यही नज़दीकी इस यात्रा की सबसे बड़ी सुविधाओं में से एक रही।
यहीं ठहर कर लगा जैसे पूरा मोहल्ला किसी दिव्य ऊर्जा से भरा हुआ है – घंटियों की आवाज़, शंख की ध्वनि, दूर से आती “हर हर महादेव” की गूंज… सब कुछ मिलकर माहौल को और भी आध्यात्मिक बना देता है।
महाकाल मंदिर के दर्शन – शीघ्र दर्शन का अनुभव
अनेको मंदिरों की तरह उज्जैन मंदिर में भी VIP टिकट की व्यवस्था है। यह व्यवस्था का नाम VIP जरूर होता है मगर असल मे यह शीघ्र दर्शन की सुविधा होती है। ऐसे प्रसिद्ध मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रहती है, जिस वजह से इन स्थानों में मुख्य गर्भगृह के दर्शन में बहुत समय लगता है मगर जिन लोगो को यह समय बचाना होता है वह टिकट लेकर दर्शन कर सकते है। शीघ्र दर्शन टिकट की मौजूदा कीमत लगभग 250 रुपये प्रति व्यक्ति है ।
टिकट लेने के कुछ फायदे जो साफ महसूस हुए:
सामान्य लाइन की तुलना में काफी कम समय में दर्शन हो गए। भीड़ में घंटों खड़े रहने की थकान से बच गए, जिससे मन भी शांत रहा और शरीर भी। बड़ों या बच्चों के साथ जाने वालों के लिए ये ऑप्शन सच में बहुत राहत देता है ।
हालांकि शीघ्र दर्शन की टिकट लिए बिना भी आप बाबा महाकाल के दर्शन कर सकते है।
वैसे तो हर क्षण भगवान के दर्शन के लिए उचित है मगर सबसे उत्तम वो समय है जब आरती होती है। आरती के समय वातावरण बदल जाता है। वेदों में जो बात मंत्रो और आरती के उच्चारण को लेकर होती है उसका साक्षात अनुभव महाकाल के इस मंदिर में अवश्य होता है।
यह हमारा सौभाग्य था कि सुबह की आरती के समय हम मंदिर के अंदर ठीक बाबा महाकाल के सामने खड़े थे। आरती प्रारंभ होते ही भक्तों की कतार को जहाँ की तहाँ रोक दिया जाता है।
महाकाल लोक – भव्यता, कला और आस्था का संगम

दर्शन के बाद मंदिर से बाहर निकलते ही महाकाल लोक के दर्शन को जा सकते हैं। महाकाल लोक आज उज्जैन का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। महाकाल लोक, महाकाल मंदिर के पास ही विकसित किया गया एक विशाल कॉरिडोर है, जिसमें भगवान शिव से जुड़े अनगिनत दृश्य, मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ दिखाई देती हैं ।
विशाल नंदी, अलग–अलग रूपों में शिव की मूर्तियाँ और लाइटिंग से सजा पूरा परिसर, मानो किसी और ही लोक में ले जाता है ।

शाम के समय हल्की–हल्की रोशनी के बीच महाकाल लोक में घूमना एक अलग ही अनुभव देता है – न सिर्फ चमक–दमक, बल्कि हर मूर्ति से जुड़ी कथा का एहसास होता है।
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महाकाल लोक का सबसे बड़ा असर ये था कि यहाँ घूमते–घूमते, सिर्फ आंखें नहीं, मन भी भर जाता है। फोटो लेने का मन करता है, पर कई बार बस चुपचाप बैठकर उस वातावरण को महसूस करने का मन करता है। महाकाल लोक में अनेक प्रकार की मूर्तियां पुराणिक कथाओं का वर्णन करती है। विशेष बात यह है कि हर मूर्ति और पुराणिक कृतियों के नीचे उस कथा का विवरण हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत में दिया गया है।
रात की आरती – स्क्रीन से भी महसूस होती है
रात्रि के समय हमने मंदिर के अंदर जाकर नहीं, बल्कि बाहर लगी स्क्रीन पर आरती देखना चुना।
बाहर बैठे–बैठे, बड़ी स्क्रीन पर बाबा महाकाल की आरती देखना, भक्ति में डूबने जैसा था।
स्क्रीन पर दिखते हर मंत्र, हर आहुति के साथ, हवा में घुली घंटियों की आवाज़ और शंख की ध्वनि – सब कुछ मिलकर ऐसा माहौल बना रहे थे कि लगा मानो हम गर्भगृह के ठीक सामने खड़े हों।
कभी–कभी भक्ति सिर्फ दूरी कम करने का नाम नहीं, बल्कि मन से जुड़ने का नाम होती है। उस रात बाहर बैठकर आरती देखना यही सिखा गया – कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए हमेशा भीड़ में धक्का–मुक्की ज़रूरी नहीं।
अगले दिन – काल भैरव मंदिर की रहस्यमयी आभा
अगले दिन की सुबह हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था – काल भैरव मंदिर। उज्जैन में स्थित काल भैरव मंदिर को शहर का कोतवाल माना जाता है, यानी उज्जैन की रक्षा करने वाले देवता।
माना जाता है कि यह मंदिर कई हज़ार साल पुराना है और राजा भद्रसेन ने इसका निर्माण कराया था । काल भैरव, भगवान शिव के उग्र स्वरूप माने जाते हैं, जो अपने भक्तों के दुख–दर्द, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करते हैं।
मुख्य मंदिर में प्रवेश के लिए आपको लंबी लाइन से गुजरना पड़ेगा जहाँ आधे से एक घंटा लगना स्वाभाविक है। मंदिर परिसर में प्रवेश एक बड़े मुख्य दरवाज़े से होता है जिसे देख मंदिर की सदियों पुरानी विरासत का ऐहसास होता है। अनेको वर्ष पुराना यह मंदिर पत्थरों से बना हुआ है जिसे छूने पर उसकी सदियों से उज्जैन की रक्षा करने की जिम्मेदारी का सबूत मिलता हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही एक अलग तरह की गंभीरता और शांति महसूस होती है। महाकाल मंदिर की भव्यता के बाद, काल भैरव मंदिर का वातावरण थोड़ा रहस्यमयी, थोड़ा गूढ़, लेकिन बेहद शक्तिशाली लगता है।
यहां की सबसे अनोखी परंपरा है मद्य चढ़ाने की रस्म, जिसमें भक्त देवता को शराब अर्पित करते हैं और मानते हैं कि काल भैरव उसे स्वीकार करते हैं । इस अद्भुत परंपरा ने हमेशा की तरह इस बार भी मन में कई सवाल जगाए, लेकिन साथ ही यह एहसास भी कराया कि आस्था का अपना एक अलग विज्ञान और इतिहास होता है, जिसे सिर्फ तर्क से नहीं, अनुभव से समझा जा सकता है।
मन में भरा सुकून और कृतज्ञता
काल भैरव मंदिर से लौटते हुए ऐसा लग रहा था जैसे इस छोटी–सी यात्रा ने मन पर कोई बड़ी छाप छोड़ दी हो। उज्जैन से घर लौटते समय बस आभार का भाव था। ऐसा लगा कि चाहे ज़िंदगी कितनी ही उलझी हुई क्यों न हो, एक बार बाबा महाकाल के दरबार आकर, मन फिर से आनंदित हो गया। यहाँ आकर दो दिन कब निकल गए पता ही नहीं चला। कालों के काल, महाकाल की यह नगरी उज्जैन में समय की अपनी परिभाषा है जिसे यही आकर महसूस किया जा सकता है।
